उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों का गजब हाल, 12 सालों में लगभग 22 हजार किमी सड़क पूरी, फिर भी लोगों के कंधे मरीज की एंबुलेंस

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उत्तराखंड के ग्रामीण इलाके बुनियादी सुविधाओं से वंचित, स्वास्थ्य, सड़क के वादे चुनावी जुमलों में वोटों की फसल काटते हैं किरणकांत शर्मा की रिपोर्ट

देहरादून: उत्तराखंड को अलग राज्य बने 26 साल पूरे होने जा रहे हैं. इन लगभग 26 वर्षों में राज्य ने सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में कई बड़े दावे किए गए. हजारों करोड़ रुपयों की योजनाएं बनीं. गांवों को सड़क से जोड़ने के लिए केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक लगातार योजनाएं संचालित हुईं. लेकिन पहाड़ की कुछ तस्वीरें आज भी विकास के इन दावों के सामने सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ी हैं.

हाल ही में बागेश्वर से मरीज को डोली में अस्पताल ले जाने की तस्वीरें सामने आईं. पौड़ी गढ़वाल में मरीज को कंधों पर उठाकर नदी पार कराने का मामला सामने आया. चंपावत में घायल किसान को डंडे में बांधकर सड़क तक ले जाने की तस्वीर ने भी बुनियादी सुविधाओं पर सवाल खड़ा किया. 26 साल बाद भी राज्य के कई ऐसे गांव हैं जहां आपात स्थिति में एंबुलेंस नहीं बल्कि ग्रामीणों के कंधे ही मरीज की पहली एंबुलेंस बनते हैं.

गढ़वाल से कुमाऊं तक समस्या एक, लेकिन सवाल कई: उत्तराखंड के पहाड़ी जिले से सामने आई तस्वीरें बताती हैं कि समस्या केवल किसी एक गांव या एक जिले की नहीं है. बागेश्वर में मरीज को डोली के सहारे अस्पताल ले जाने की तस्वीर सामने आई तो पौड़ी में ग्रामीण मरीज को कंधों पर उठाकर नदी पार कराने को मजबूर दिखाई दिए.

चंपावत के बकोड़ा गांव की तस्वीर में घायल किसान को डंडे में बांधकर सड़क तक ले जाने की मजबूरी सामने आई. इन घटनाओं की सबसे गंभीर बात यह है कि ये किसी दूर अतीत की तस्वीरें नहीं, बल्कि अगस्त 2026 में सामने आईं घटनाएं हैं.

उत्तराखंड के गठन के 26 साल बाद भी कुछ गांवों में बीमारी, दुर्घटना या प्रसव जैसी आपात स्थिति का पहला समाधान स्वास्थ्य विभाग की एंबुलेंस नहीं, बल्कि ग्रामीणों की सामूहिक मेहनत है. यह स्थिति बताती है कि स्वास्थ्य और सड़क की परस्पर निर्भरता को उजागर करती है. क्योंकि अस्पताल गांव से दूर हैं तो सड़क जरूरी है. और अगर सड़क नहीं है तो डॉक्टर, एंबुलेंस और अस्पताल होने के बावजूद मरीज समय पर वहां नहीं पहुंच सकता.

सरकारी आंकड़ों में सड़कों का जाल: ऐसा नहीं है कि प्रदेश में सड़कें नहीं बनी हैं. अगर आंकड़ों की बात करें तो केंद्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा 21 जुलाई 2026 को लोकसभा में दिए गए जवाब के मुताबिक, साल 2014 से प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के सभी घटकों के तहत उत्तराखंड में 16 जुलाई 2026 तक 21 हजार 902 किलोमीटर लंबी सड़कें पूरी की जा चुकी है. इनके माध्यम से 1 हजार 860 गांव को सड़क संपर्क मिला है.

ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि कई गांव में आज भी मरीजों को कंधों का सहारा लेकर अस्पताल क्यों जाना पड़ता है? हालांकि, PMGSY के मुताबिक, सड़क बनने का अर्थ, गांव या अस्पताल के दरवाजे तक पहुंचना नहीं है. पहाड़ी भूगोल, छोटी आबादी वाली बसावटें, वन भूमि, भूमि हस्तांतरण, भूस्खलन, पुल और नालों की जरूरत और सड़क की पात्रता जैसे कई कारक ग्रामीण कनेक्टिविटी को प्रभावित करते हैं.

प्रदेश में इसका असर कई जगह दिखाई देता है. केंद्र के वर्षवार आंकड़ों को देखें तो वित्तीय वर्ष 2023-24 में उत्तराखंड के लिए PMGSY के तहत 1,241 किलोमीटर सड़क स्वीकृत, 594 किलोमीटर पूरी जबकि 2,273 किलोमीटर सड़क की स्वीकृति बाकी दर्ज की गई थी. 2024-25 में कोई स्वीकृति नहीं थी. लेकिन 966 किलोमीटर सड़क पूरी, जबकि 1,297 किलोमीटर सड़क की स्वीकृति की सूची में लंबित रही. 2025-26 में उत्तराखंड के लिए नई स्वीकृति सड़क का आंकड़ा शून्य रहा, 356 किलोमीटर सड़क पूरी है, वहीं 2,643 किलोमीटर सड़क स्वीकृत होने के लिए शेष रही. वहीं साल 2026-27 में 1,651 किलोमीटर सड़क की स्वीकृति लंबित है.

आंकड़े बताते हैं कि सड़क निर्माण केवल नई सड़क स्वीकृत करने का मामला नहीं है, बल्कि पुरानी स्वीकृत परियोजनाओं को पूरा करना भी बड़ी चुनौती है.

250 की आबादी वाला मानक: PMGSY के मौजूदा नियमों में हिमालयी राज्यों के लिए सामान्य 500 की जगह 250 या उससे अधिक आबादी वाली बसावटों को भी सभी मौसमों में सड़क संपर्क देने के लिए पात्र माना जाता है. छोटे पहाड़ी गांवों के लिए केंद्र की योजना में विशेष प्रावधान मौजूद है. लेकिन जमीनी समस्या यह है कि सड़क की स्वीकृति, सड़क का निर्माण और सड़क का सालभर उपयोगी रहना, तीन अलग-अलग चरण हैं. बरसात में सड़क टूटना, पुलिया बहना, भूस्खलन होना या गांव से मुख्य सड़क तक अंतिम कुछ किलोमीटर का संपर्क नहीं होना, मरीज के लिए पूरी कनेक्टिविटी को बेकार कर देता है.

सड़क, अस्पताल और सुविधाओं पर सवाल: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्या का कहना है कि, राज्य में स्वास्थ सेवा की हालत किसी से छिपी नहीं है. बारिश के दिनों में लोगों को अधिक दिक्कत होती है. ये पहाड़ी राज्य का दुर्भाग्य है. सितंबर 2025 में कुमाऊं मंडल के छह जिलों के उपलब्ध आंकड़ों में डॉक्टरों के 1,039 स्वीकृत पदों में 432 पद रिक्त बताए गए थे. बागेश्वर में 107 स्वीकृत पदों में 31 रिक्त थे और 9 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र चिकित्सकविहीन बताए गए. चंपावत में 111 के मुकाबले केवल 60 डॉक्टर कार्यरत बताए गए. जबकि नैनीताल में 340 में से 87 पद खाली थे. उधम सिंह नगर में 226 स्वीकृत पदों में 131 रिक्त बताए गए और 33 पीएचसी में 18 में चिकित्सा अधिकारी नहीं थे.

ये आंकड़े भले ही कुमाऊं मंडल के 2025 के हों, लेकिन यह साफ करते हैं कि पहाड़ में चुनौती केवल सड़क तक सीमित नहीं है. सड़क के बाद स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर और विशेषज्ञ उपलब्ध होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है.
-यशपाल आर्या, कांग्रेस नेता-

CAG रिपोर्ट में दिखी स्वास्थ्य ढांचे की कमजोर कड़ी: उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में भी गंभीर मानव संसाधन की कमी सामने आ चुकी है. रिपोर्ट के कार्यकारी सारांश के मुताबिक,

‘चिकित्सा शिक्षा विभाग में चिकित्सकों के 64 प्रतिशत नर्सों के 81 प्रतिशत और पैरामेडिकल स्टाफ के 79 प्रतिशत पद रिक्त पाए गए थे. कुछ पर्वतीय जिलों में चिकित्सकों की कमी 75 प्रतिशत तक बताई गई थी. इसका सीधा असर यह है कि गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मौजूद होने के बावजूद गंभीर मरीज को जिला अस्पताल या मेडिकल कॉलेज रेफर करना पड़ता है. ऐसे में यदि गांव से मुख्य सड़क तक पहुंचने में ही घंटों लग जाएं तो स्वास्थ्य सेवा की पूरी कड़ी ही कमजोर हो जाती है’.

स्टाफ की कमी दूर करना चुनौती: स्वास्थ्य सचिव विनय शंकर पांडे का कहना है कि,

राज्य सरकार की ओर से भी स्वास्थ्य क्षेत्र में स्टाफ की कमी दूर करने के प्रयास किए गए हैं. मुख्यमंत्री धामी ने 220 नवनियुक्त चिकित्सा अधिकारियों को नियुक्ति पत्र सौंपे थे. जुलाई 2026 में सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं के सुदृढ़ीकरण को लेकर प्रतिबद्धता दोहराते हुए बताया कि, आयुष्मान भारत योजना के तहत प्रदेश में 12 लाख से अधिक मरीजों को निःशुल्क उपचार का लाभ मिला है. सरकार ने हर क्षेत्र के लिए हेली एंबुलेंस सेवा शुरू करने और सभी सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में स्टाफ की कमी दूर करने के लगातार प्रयास किए हैं. अब काफी हद तक हालात पटरी पर आ रहे हैं.
-विनय शंकर पांडे, स्वास्थ्य सचिव-

उधर, सीएम धामी ने सचिवालय में आयोजित कैबिनेट बैठक में प्रदेशभर की सड़कों की स्थिति और उनके सुधार के संबंध में अधिकारियों से विचार किया. बैठक में नगर निगम, नगर पालिका परिषद एवं नगर पंचायत क्षेत्रों के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों की सड़कों को दुरुस्त करने के लिए व्यापक स्तर पर कार्य करने पर चर्चा हुई. सीएम धामी ने कहा कि,

लोक निर्माण विभाग और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) सहित विभिन्न विभागों एवं संस्थाओं के अधीन आने वाली सड़कों को दुरुस्त करने के लिए प्रभावी कार्ययोजना बनाई जाए. मॉनसून खत्म होते ही प्रदेशभर में सड़क सुधार के कार्य एक साथ युद्धस्तर पर शुरू किए जाने चाहिए. इसके लिए संबंधित विभाग अभी से आवश्यक तैयारियां सुनिश्चित करते हुए निविदा प्रक्रिया समय से पूर्ण कर लें, ताकि बारिश खत्म होने के बाद निर्माण एवं मरम्मत कार्य शुरू करने में किसी प्रकार का विलंब न हो.
-पुष्कर सिंह धामी, मुख्यमंत्री-

आंकड़ों और तस्वीरों के बीच फंसा पहाड़: उत्तराखंड के 26 साल पूरे होने की कहानी को केवल यह कहकर खत्म नहीं किया जा सकता कि हजारों किलोमीटर सड़कें बन चुकी हैं और अस्पतालों की संख्या बढ़ी है. असली सवाल यह है कि राज्य के सबसे दूरस्थ गांव में रहने वाला व्यक्ति गंभीर बीमार पड़ने पर कितनी देर में अस्पताल पहुंचता है? यदि उसे पहले चार लोगों के कंधों पर उठाकर डंडी कंडी से सड़क तक लाना पड़े, फिर वाहन मिले और उसके बाद जिला अस्पताल या मेडिकल कॉलेज तक पहुंचना पड़े, तो कागज पर मौजूद स्वास्थ्य सुविधा उसके लिए कितनी उपयोगी हुई?

इसी तरह सड़क की लंबाई बढ़ने के बावजूद यदि हर मॉनसून में सड़क बंद हो जाए तो कनेक्टिविटी का दावा कितना स्थायी है? उत्तराखंड की 26 साल की यात्रा में अब अगला लक्ष्य केवल नई सड़कें और नए अस्पताल बनाना नहीं होना चाहिए, बल्कि हर गांव से हर मौसम में मोट मार्ग हर गंभीर मरीज के लिए समयबद्ध एंबुलेंस और हर प्रमुख ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र पर पर्याप्त डॉक्टर-विशेषज्ञ उपलब्ध कराना होना चाहिए.