विरोधाभासी मॉनसून! बागेश्वर में 124% ज्यादा, पौड़ी में 41% की कमी, कहीं आफत-कहीं सूखा
उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में बारिश के आंकड़ों में बदलाव दर्ज किया गया. मौसम विभाग ने दोनों पहलुओं को गंभीर बताया. रिपोर्ट- नवीन उनियाल.
देहरादून: जून महीने के आखिरी दिन उत्तराखंड पहुंचे मॉनसून का राज्य में जबरदस्त असर देखने को मिल रहा है. स्थिति यह है कि एक महीने में हैरतअंगेज आंकड़ों के साथ कई जगह बेहद ज्यादा बारिश रिकॉर्ड की जा रही है. जबकि कुछ जगहों के हालात अब भी सूखे जैसे हैं. इन्हीं आंकड़ों का अध्ययन करने वाले वीर चंद्र सिंह गढ़वाली उत्तराखंड औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय भरसार के प्रोफेसर एसपी सती कुछ नए मौसमी फैक्टर्स के बारे में बता रहे हैं. साथ ही बारिश में बदलते पैटर्न के खतरे से भी आगाह कर रहे हैं.
उत्तराखंड में मॉनसून सीजन शुरू हुए अभी एक महीना भी पूरा नहीं हुआ है, लेकिन बारिश के आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं. राज्य के अलग-अलग जिलों में बारिश का अंतर इतना ज्यादा है कि कहीं सामान्य से दोगुने से भी अधिक बारिश रिकॉर्ड की जा रही है, तो कहीं सामान्य बारिश का आधा हिस्सा भी पूरा नहीं हो पाया है. यही वजह है कि मॉनसून सीजन के दौरान उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में बारिश का बदलता पैटर्न वैज्ञानिकों और मौसम विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय बन गया है.
बारिश के आंकड़ों का महत्वपूर्ण संकेत: उत्तराखंड में आधिकारिक तौर पर मॉनसून ने 30 जून को दस्तक दी थी. हालांकि मौसम विभाग की गणना के अनुसार, एक जून से मॉनसून सीजन की शुरुआत मानी जाती है. ऐसे में जून महीने की शुरुआत से अब तक राज्य के अलग-अलग जिलों में हुई बारिश के आंकड़ों का विश्लेषण कई महत्वपूर्ण संकेत दे रहा है. राज्य में औसतन बारिश सामान्य के आसपास ही है, लेकिन जिलेवार आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर बेहद अलग नजर आती है.
कहीं बारिश सामान्य से 124 फीसदी अधिक हो चुकी है, तो कहीं सामान्य से 41 फीसदी कम बारिश रिकॉर्ड की गई है. यानी एक ही राज्य में कुछ जिले बारिश से लबालब हैं, जबकि कुछ इलाकों में अब भी सूखे जैसे हालात बने हुए हैं.
बागेश्वर में सबसे ज्यादा बारिश: 1 जून से 21 जुलाई के बीच रिकॉर्ड किए गए आंकड़ों के मुताबिक, सबसे ज्यादा बारिश वाले जिलों में बागेश्वर सबसे ऊपर है. बागेश्वर में सामान्य से 124 फीसदी अधिक बारिश रिकॉर्ड की गई है. आंकड़ों के मुताबिक, इस अवधि में बागेश्वर में सामान्य बारिश करीब 341.7 मिलीमीटर मानी जाती है, लेकिन अब तक यहां 763.8 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड की जा चुकी है. यानी जितनी बारिश सामान्य तौर पर इस अवधि में होनी चाहिए थी, उससे दोगुने से भी ज्यादा बारिश जिले में हो चुकी है.
ज्यादा बारिश से बढ़ जाता है खतरा: बागेश्वर में बारिश का यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि मॉनसून सीजन की शुरुआत ही हुई है. सीजन के शुरुआती दौर में ही इतनी अधिक बारिश होने से आने वाले दिनों में अतिवृष्टि भूस्खलन और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है. पहाड़ी इलाकों में कम समय में अधिक बारिश होने पर इसका असर सिर्फ नदियों और नालों पर ही नहीं पड़ता, बल्कि सड़क, पुल, खेत और आबादी वाले क्षेत्रों पर भी दिखाई देता है.
बारिश के मामले में टिहरी गढ़वाल दूसरे प्रमुख जिलों में शामिल है. यहां सामान्य से 46 फीसदी अधिक बारिश रिकॉर्ड की गई है. टिहरी में इस अवधि के दौरान सामान्य बारिश करीब 346.4 मिलीमीटर मानी जाती है, जबकि अब तक 505.6 मिलीमीटर बारिश दर्ज की जा चुकी है. यानी जिले में सामान्य से काफी अधिक बारिश हो चुकी है.
तीसरे नंबर पर चमोली जिला है, जहां सामान्य से करीब 40 फीसदी अधिक बारिश रिकॉर्ड की गई है. चमोली में इस अवधि में सामान्य बारिश 286.8 मिलीमीटर मानी जाती है, लेकिन अब तक यहां 401.2 मिलीमीटर बारिश दर्ज की जा चुकी है. पहाड़ी और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बारिश का यह बढ़ा हुआ आंकड़ा स्थानीय स्तर पर कई तरह की चुनौतियां पैदा कर सकता है.
पौड़ी में सामान्य से कम बारिश: लेकिन उत्तराखंड की तस्वीर का दूसरा पहलू इससे बिल्कुल अलग है. जहां बागेश्वर में सामान्य से 124 फीसदी अधिक बारिश हुई है, वहीं पौड़ी गढ़वाल में सामान्य से 41 फीसदी कम बारिश रिकॉर्ड की गई है. पौड़ी में इस अवधि के दौरान सामान्य बारिश करीब 434.4 मिलीमीटर होनी चाहिए थी, लेकिन अब तक यहां सिर्फ 257 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड की गई है.
इन जिलों में भी कम बारिश: कम बारिश वाले जिलों में नैनीताल भी शामिल है. नैनीताल में सामान्य से 34 फीसदी कम बारिश हुई है. यहां सामान्य बारिश 700.5 मिलीमीटर मानी जाती है, जबकि अब तक 464.2 मिलीमीटर बारिश ही रिकॉर्ड की गई है. वहीं चंपावत में भी सामान्य से 31 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है. चंपावत में सामान्य बारिश 565.5 मिलीमीटर मानी जाती है, जबकि अब तक यहां 389.5 मिलीमीटर बारिश हुई है.
यानी राज्य के कुछ जिलों में जहां बारिश सामान्य से काफी अधिक है, वहीं कुछ जिले सामान्य बारिश के आंकड़े से काफी पीछे चल रहे हैं. इस अंतर को सिर्फ सामान्य मौसमी बदलाव मानकर नजरअंदाज करना आसान नहीं है. विशेषज्ञों का मानना है कि, बदलते मौसम और जलवायु परिवर्तन के दौर में बारिश का पैटर्न तेजी से बदल रहा है.
प्रदेश में सामान्य से कम बारिश: प्रदेश में ओवरऑल बारिश की बात करें तो अब तक करीब चार फीसदी कम बारिश रिकॉर्ड हुई है. मौसम विभाग के लिहाज से यह आंकड़ा सामान्य के आसपास माना जाता है. लेकिन जब इसी आंकड़े को जिलेवार देखा जाता है तो स्थिति काफी अलग दिखाई देती है. एक जिले में सामान्य से 124 फीसदी अधिक बारिश और दूसरे जिले में 41 फीसदी कम बारिश यह बताती है कि बारिश का वितरण बेहद असमान्य हो गया है.
वीर चंद्र सिंह गढ़वाली उत्तराखंड औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, भरसार के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर एसपी सती के मुताबिक,
ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का असर बारिश के पैटर्न पर साफ दिखाई दे रहा है. बारिश का वितरण अब पहले जैसा नहीं रह गया है. कई जगहों पर कम समय में बहुत अधिक बारिश हो रही है, जबकि कुछ क्षेत्रों में लंबे समय तक बारिश नहीं हो रही.
– प्रो. एसपी सती, प्रोफेसर, पर्यावरण विज्ञान विभाग भरसार विवि –
बदलता पैटर्न चिंता का विषय: यही बदलता पैटर्न सबसे बड़ी चिंता का कारण है. पहले जो बारिश पूरे मॉनसून सीजन में धीरे-धीरे होती थी, अब कई बार उसका बड़ा हिस्सा कुछ ही दिनों में बरस जाता है. इसका सीधा असर यह होता है कि जमीन को पानी सोखने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता. नदियों और गदेरों में अचानक पानी बढ़ जाता है और पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन की घटनाएं बढ़ने लगती हैं.
ज्यादा और कम बारिश, दोनों ही समस्या: बारिश की तीव्रता बढ़ने का असर कृषि और बागवानी पर भी पड़ता है. लगातार और अत्यधिक बारिश से खेतों में जलभराव हो सकता है. वहीं दूसरी ओर जिन क्षेत्रों में बारिश कम हो रही है, वहां फसलों और पेयजल स्रोतों पर दबाव बढ़ सकता है. इस तरह एक ही राज्य में अधिक और कम बारिश, दोनों ही अलग-अलग तरह की समस्याएं पैदा कर रहे हैं.
आपदा का एक कारण ये भी: उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य में बारिश का महत्व और भी अधिक है. राज्य की अर्थव्यवस्था और ग्रामीण जीवन काफी हद तक प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है. बारिश से पेयजल स्रोत रिचार्ज होते हैं, खेती को पानी मिलता है और जंगलों और पारिस्थितिकी तंत्र को भी आवश्यक नमी मिलती है. लेकिन जब बारिश सामान्य तरीके से न होकर अचानक और बेहद तीव्र रूप में होती है, तो यही बारिश आपदा का कारण भी बन सकती है.
मौसम विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक रोहित थपलियाल के मुताबिक, राज्य में अब तक मॉनसून के दौरान हुई कुल बारिश सामान्य के करीब है. हालांकि, जिलों के स्तर पर बारिश में काफी वेरिएशन देखा जा रहा है. कुछ जिलों में सामान्य से काफी अधिक बारिश हुई है, जबकि कुछ जिलों में बारिश सामान्य से काफी कम रही है. पिछले कुछ वर्षों में भी इस तरह का अंतर देखने को मिला है.
– रोहित थपलियाल, मौसम वैज्ञानिक, उत्तराखंड मौसम विज्ञान केंद्र –
बदलाव बन सकता है चुनौती: यानी आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि उत्तराखंड में बारिश की कुल मात्रा भले ही सामान्य के आसपास हो, लेकिन बारिश का वितरण और उसका समय बदल रहा है. यह बदलाव आने वाले वर्षों में मौसम पूर्वानुमान, आपदा प्रबंधन और जल संसाधन प्रबंधन के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है.
विशेष ध्यान की जरूरत: ऐसे में आने वाले दिनों में मौसम की निगरानी और जिलेवार बारिश के आंकड़ों पर लगातार नजर रखना बेहद जरूरी होगा. खासतौर पर उन जिलों में जहां सामान्य से काफी अधिक बारिश हो रही है, वहां भूस्खलन, अचानक बाढ़ और सड़क संपर्क बाधित होने जैसी घटनाओं को लेकर प्रशासन को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी होगी.
वहीं कम बारिश वाले जिलों में जलस्रोतों, खेती और पेयजल की स्थिति पर भी नजर रखनी होगी. क्योंकि जलवायु परिवर्तन का असर सिर्फ अत्यधिक बारिश के रूप में ही नहीं, बल्कि बारिश की कमी के रूप में भी सामने आ रहा है.उत्तराखंड में इस मॉनसून सीजन की अब तक की तस्वीर यही बता रही है कि बारिश हो रही है, लेकिन हर जगह एक जैसी नहीं. कहीं बादल जमकर बरस रहे हैं, तो कहीं आसमान अब भी उम्मीद लगाए हुए है. मौसम का यह बदलता मिजाज आने वाले समय में उत्तराखंड के लिए कितना बड़ा खतरा बन सकता है, इसका जवाब आने वाले दिनों की बारिश देगी. लेकिन फिलहाल आंकड़े साफ तौर पर चेतावनी दे रहे हैं कि पहाड़ों में बारिश का पैटर्न बदल रहा है और इस बदलाव को समझना अब पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है.
